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तेरी बुराइयों को हर अख़बार कहता है

तेरी बुराइयों को हर अख़बार कहता है | फिर भी तू मेरे गांव को गंवार कहता है || ऐ शहर ! मुझे तेरी औकात पता है | तू चुल्लू भर पानी को भी वाटर पार्क कहता है || थक गया है हर शख़्स काम करते करते | और तू इसे अमीरी का बाज़ार कहता है || गांव  चल  वक्त ही वक्त है सबके पास | तेरी सारी   फुरसत तेरा इतवार कहता है | मौन होकर, फोन पर रिश्ते निभाए जा रहे हैं | तू इस मशीनी- दौर को परिवार कहता है || जिनकी सेवा में खपा देते थे जीवन सारा, तू उन माँ - बाप को अब भार  कहता है || वो मिलने आते थे तो, कलेजा साथ लाते थे | तू दस्तर निभाने को रिश्तेदार कहता है || बड़े - बड़े मसले हल करती थीं पंचायतें | तू अंधी भ्रष्ट दलीलों को दरबार कहता है || बैठ जाते थे अपने- पराये   सब बैलगाड़ी में | पूरा परिवार भी न बैठ पाए उसे तू कार कहता है || अब बच्चे भी बड़ों का अदब  भूल बैठे हैं | तू इस नए दौर को संस्कार कहता है || तेरी बुराइयों  को हर  अख़बार  कहता है | फिर भी तू मेरे  गांव  को  गंवार  कहता है || Wri...
अभी कुछ दिन पहले १४ फरबरी को जम्मू कश्मीर के श्रीनगर  से २० किमी दूर स्थित अवन्तीपुरा में अति सुरक्षित  नेशनल हाईवे पर एक आत्मघाती आतंकी ने  पुलवामा हमले को अंजाम दिया | माना  जा रहा  है की उरी घटना के बाद यह सबसे बड़ा हमला था ३५० किलो विस्फोटक के साथ एक स्कार्पिओ ने CRPF  के जवानो को ले जाती बस से टक्कर मार दी और हमारे ४० से अधिक जवानों  के चिथड़े- चिथड़े उड़ गए | सबके लिए यह असहनीय था पर यह भी तो सोचने वाली बात है की जब हाईवे अति सुरक्षित क्षेत्र में आता है तो वहां ३५० किलो विस्फोटक लिए स्कार्पिओ कैसे घुस गयी ? अमूमन  १००० जवान एक काफिले का हिस्सा होते हैं पर इस बार यह संख्या २५०० से ज्यादा थी | २-३ दिनों से भरी बर्फवारी व अन्य कारणों  से राजमार्ग पर आवाजाही नहीं थी | फिर इस सबकी सूचना आतंकियों को किसने दी? आत्मघाती हमलावर की पहचान भी कश्मीरी युवक के रूप में हुयी | परन्तु इस घटना के बाद घटित  देशव्यापी घटनाएं भी कम आहत करने वाली ना थीं |  जहाँ एक ओर जनता का रवैया असंवेदनीय...

barish

आज अचानक आती बारिश के मौसम से परेशान आसमान को निहारते लोगों को देख कर अनायास ही उस किसान का ध्यान आ गया जो इस बेमौसम बारिश से परेशान हो जाता है और भगवान से प्रार्थना करता है कि हे प्रभु! मेरी फसल बचा लो । इन्ही विचारों में खोये खोये न जाने कब अपने पुराने दिन याद आ गए जब ऐसी बारिश आती देख हम भी अपने बड़ो के साथ अपने खेत में भागते थे और कोशिश करते थे ज्यादा से ज्यादा फसल को सुरक्षित कर पाएं । साथ में मन ही मन भगवन से दुआ करते थे की हे भगवन ! सिर्फ २-४ दिन ही बारिश रोक दो ताकि तब तक हमारी फसल घर के अंदर पहुंच जाये।   
आज तेरु भोल मेरु वक्त चा .  आज तेरु भोल मेरु, ना हैंस दगड़्या वक्त चा  तेरा बाटो मा भि रै होला कांडा,  पर मेरु त बाटू ही कांडू कु च  ना हैंस दगड़्या वक्त चा, आज तेरु भोल मेरु ना हैंस दगड़्या वक्त चा, तेरा पिछाड़ी त लगीं लैन दुनिया वालों की  पर अपड़ी त यख कैथे सुध भि नीच  ना हैंस दगड़्या वक्त चा, आज तेरु भोल मेरु ना हैंस दगड़्या वक्त चा, तू त छे द्यखणू सभि सुख अपणा घौर भटि, म्यार त यूँ सुखों का बाना अपरू घौर छ्वड्यूं च ना हैंस दगड़्या वक्त चा, आज तेरु भोल मेरु ना हैंस दगड़्या वक्त चा..... माना कि तिल सर्या उकाल टैपि याली एक ससि पर बिसौण कैरिक मी भि लग्यूं छौं सरासरि ना हैंस दगड़्या वक्त चा, आज तेरु भोल मेरु ना हैंस दगड़्या वक्त चा, आज तेरु वक्त चलणू चा, मेरु त  जमानु ही आलु ना हैंस दगड़्या वक्त चा, आज तेरु भोल मेरु ना हैंस दगड़्या वक्त चा, by  Vikas Bhardwaj (०९. ०१.२०१८)

मिलावट

बड़े शहर में खूब देखी मिलावट, रिश्तों - नातों में बहुत दिखी मिलावट खाने- पीने के सामान में मिलावट सजावट में दिखी,  मिलावट दिखावट में घुली,  मिलावट खूबसूरती में मेकअप की मिलावट खाने में भी थी कंकड़ों की मिलावट दवा- दारु में थी  मिलावट कच्चे घरों में खूबसूरती की मिलावट  खून में यूँ बस गयी ये  मिलावट अब तो मिलावट ही हमें भाती है बिन मिलावट चीजें पसंद नही आती हैं बिन यूरिया दूध हज़म नही होता है बिन मेकअप दुल्हन पसंद नही आती है बिन चमक के चीजें नही लुभाती हैं मिलावट  अनोखे सफर में  अब  इंसान भी मिलावटी बन गया । इस मिलावट की दुनिया में अब तो हम भी मिलावटी ही हो गए।

महंगाई

जो हर दिन हर घड़ी  बढ़ती जाये, वह है महंगाई  हर रोज हमें रुलाये  हर दिन हमें चिढ़ाये  गरीब का खून - पसीना  चूस जाये, वह है महंगाई  इंसानियत खत्म करने  पे है आई , हाय रे !महंगाई 
एक बच्चा जब  रोज स्कूल जाते वक्त रास्ते में पड़ने वाले बाजार में सजी जलेबी की दुकानों को देखता तो उसका जी ललचा जाता था। उसका बहुत मन होता की काश वो इन जलेबियों को खरीद कर खा पता तो कितना अच्छा होता। एक दिन स्कूल की फीस के पैसे हाथ में देखकर बच्चे से रहा नही गया और उसने उन पैसों से जलेबी खरीद लीं। वह बहुत खुश था की आज उसे इतनी रसीली जलेबी खाने का मौका मिल ही गया। पर  ख़ुशी बहुत देर  तक न रही अचानक उसे ध्यान आया की अब स्कूल की फीस का क्या होगा ?           वह स्कूल गया और इसी डर में डूबा रहा की अब वह फीस कहाँ से लाकर देगा? क्योंकि घर से तो फीस दुबारा मिलने वाली थी नही और फीस के पैसो से जलेबी खाने वाली बात घर में वह किसी को बता भी नही   सकता था। एक दो दिन तक तो टीचर भी फीस के लिए बोलते रहे पर फिर टीचर ने फीस लाकर न   देने पर स्कूल से नाम काटे जाने की बात कह  दी तो मासूम बालक डर  गया। अगले दिन बच्चा स्कूल जाने से कतराने लगा और वह स्कूल न जा कर गाँव के किनारे एक बरगद के पेड़ के पास जा कर छिप ग...