पलायन प्रवृति या जरूरत

इंसान आदि काल से ही अपनी जरूरतों के लिए अपने निवास स्थान परिवर्तित करता रहा है। इसी प्रवृति ने उसे घुमक्कडी और पलायन प्रेमी बना  दिया। उसने सारी  दुनिया  में हर जगह निवास भी कर लिया और धरती के बाहर भी अपने लिए निवास के लिए उचित स्थान   की तलाश में है।   इंसान की यही पलायन प्रवृति  आज हमारे देश के हर एक कोने में एक समस्या बन कर उभर रही  है । हर क्षेत्र में आज पलायन के कारण अनेकों समस्याएं उभर कर आ रही हैं।
 जहाँ इससे एक ओर बड़े शहरों में भीड़ और अव्यवस्था की स्थिति पैदा हो रही है वहीं दूसरी ओर गांव पलायन की मार से बंजर होते जा रहे हैं। जहाँ भी देखो एक ही स्वर सुनाई देता है, विकास, विकास और विकास। पर यह समझ नही आता की विकास तो इंसान खुद करता है । एक वही है, जो अपनी जरूरतों के हिसाब से चीज़ों को बदल कर उन्हें नवीन स्वरूप प्रदान करता है जिसे विकास का नाम दिया गया है। वही विकास जिसने इंसान के जीवन को आसान और सुगम बना दिया। आज उसने बस, रेल, मेट्रो, हवाईजहाज, अनेकों-अनेक मशीनें बना दी ताकि उसका जीवन आसान और खुशहाल हो सकते। यह सब उसने अपनी अक्लमंदी के बल-बूते पर किया है ।
भगवान ने उसे जो बुद्धि प्रदान की उसका सदुपयोग करके उसने अपने बल पर अपना जीवन आसान किया है, अन्य जीवों की तरह वह प्रकृति पर निर्भर न रहकर खुद अपना भाग्य-विधाता बनाना चाहता है। वह जो चाहे उसे पाने की कोशिश करता रहता है, इस सब के लिए वह खुद को तथा अपने आस-पास मौजूद सभी प्रकृति- प्रदत वस्तुओं को भी दांव पर लगा देता है।
मनुष्य जानता है कि वो जिस विकास को पाना चाहता है, वह उसे और कोई लेकर नही देगा बल्कि उसे, उसके लिए स्वयं प्रयासरत रहना होगा।
आज हम किसी क्षेत्र- विशेष में रहना पसंद नही करते अगर वहां जीवन जीने की मूलभूत सुविधाएँ नही हों । शायद हमारे  विकास की यही  दौड़ हमे उस क्षेत्र से भाग जाने पर मजबूर कर देती है । हम भूल जाते हैं की हम भाग कर आखिर कहाँ जायेंगे? क्या हम हर  जगह से हर बार यूँ भाग कर विकास की उस रफ़्तार को थाम पाएंगे  जिसकी हमें लालसा है?  हमारा यूँ भाग जाना क्या इस मुसीबत का हल है? हम एक बार भी नही सोचते की जिस अंधी दौड़ में हम शामिल होने जा रहे हैँ वह कितनी सही है? कई ऐसे सवाल जिनका जवाब 'नही' में होगा फिर भी हम वही करते हैं जो हमें करना ही नही चाहिए। चाहे वह पलायन हो या फिर किसी क्षेत्र- विशेष से किसी अन्य विकसित क्षेत्र में विस्थापन।
क्योंकि  अगर हम इसी तरह  के लिए जगह बदलते रहे तो न हमारी समस्या हल होगी और ना ही जो अविकसित क्षेत्र है उसका विकास होगा। जिन शहरों की ओर हम भाग रहे हैं, आखिर उनकी भी एक क्षमता है सभी लोग उतनी सी जगह में भी तो नही समा सकते। आज हमारे पलायन ने इन शहरों में बहुमंजिला इमारतों को खड़ा होने पर मजबूर कर दिया है चाहे वह हमारे लिए एक खतरा बनकर ही क्यों न उभरे पर हमे फर्क नही पड़ता। हमे तो  विकास की चमक से मतलब है, उसके लिए प्रकृति के नियमों से खिलवाड़ हो तो हो उससे हमे क्या?
गांव के गांव बंजर पड़ रहे हैं जो की हमारे जीवन यापन के लिए एक मनोरम स्थल हो सकते थे पर नही हमे तो शहरो में हो रहना है। चाहे वह विकास के नाम पर एक छलावा ही क्यों न हो? इस आसान जिंदगी की चाह में आज हजारों निम्न और निम्न मध्यम वर्गीय परिवार एक बद  से बदत्तर जिंदगी जीने पर मजबूर हैं। जो गांवों में खेती करके कुटीर उद्योगों से अपना जीवन इससे भी कई गुना अच्छे से व्यतीत कर सकते हैं। वो आज इन शहरों में एक घुटन भरी जिंदगी जीने को मजबूर हैं। छोटे-छोटे बंद कमरों में जहाँ किसी मेहमान के आ कर बैठने की भी जगह नही है वहां दिन काटने पर मजबूर हैं।
पर फिर भी एक दूसरे की देखा सीखी हो या यही आसान राह हो जो भी हो वो सब यही करने पर मजबूर हैं, और साथ ही उनकी आगे आने वाली पीढ़ियां भी इस राह का अनुसरण कर रही हैं। जो अपने बड़े- बुजुर्गों को गांवों में एकाकी जीवन जीने पर मजबूर कर रही है साथ ही संयुक्त परिवार परम्परा को  समाप्त कर चुकी है।  खुद के अच्छे भविष्य के लिए अपनों से और अपने कर्तव्यों से मुंह मोड़ कर विकास की इस नई रफ़्तार को पकड़ने की कोशिश में है। यह जानते हुए भी की जो विकास है, वो तो इंसान के होने और उसकी कोशिशों से ही मुक़्क़मल है। उसके समस्या को छोड़ कर भाग जाने से तो विकास कभी भी सम्भव नही है।
अंत में यही कहना है - जो सभी पलायन कर चुके लोगों के सीने में दर्द है, न  उनसे छिपा है, न दुनिया से।  आखिर वो सब भी पलायन करने के बाद भी अपनी जन्मभूमि को बंजर पड़ा देख छटपटा उठते ही  हैं। हर बार बस  एक ही मन्नत मांगते हैं शायद,…  कि काश वो दिन फिर लौट आएं हम वापस कभी अपनी वादियों में फिर से लौट  पाएं। शायद हम कभी यह कोशिश कर पाएं ………


गुमनाम जिंदगी बहुत जी ली -
बस अब एक काम हो जाये
नाम हो या ना हो -२
एक ही जिंदगी है
आखिर वो तो चैन से जी जाए
शायद वक्त ना मिलेगा फिर
गलतियों को सुधारने का -२
अब होश आया है तो
कम से कम आगे गलती ना हो
 ऐसी तो कोशिश की जाए। .......


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barish

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